आज मेरा आँगन महका
लेखक... फौज़िया अफ़ज़ाल (फ़िज़ा)...
आज घर में बड़ी चहल पहल थी। सबकी आवाज़ें सुनाई पड़ रही थी। मेरी बेटियां मुझे आवाज़ दें रही थी। मेरे बेटो की खनकदार आवाज़ मुझे बार बार मां कह कर पुकार रही थीं। उनके बाबू जी की भरी-भरी आवाज़ मुझे कह रही थी तुम उठ जाओ उठती क्यों नहीं?
और मैने कोशिश की उठ के देखूं कौन कौन आया है ? क्या हुआ ? जो मेरे बच्चे परदेस से भी आ गए ।
मन एक दम व्याकुल सा हो गया उठने की कोशिश की पर शरीर नहीं हिला, लगा शायद अब दम नहीं रहा मुझ में ,बूढ़ी हो गई हूं।
दोबारा शरीर हिलाया ज़ोर लगाया , पर बेअसर, निर्जीव…कोई धड़कन नहीं….
यह क्या ? क्या मै जीवित नहीं?
मेरे शरीर में कोई हलचल नहीं ?
हां कुछ हुआ था मुझे और एक के बाद एक सारी पिछले 2 दिनों की बाते याद आ गई।
तो क्या! आज मेरे जाने के बाद मेरे बच्चे आए है , सारी उमर मैने इनका एक साथ आने का इंतज़ार किया।
रात दिन अकेले यह सोच कर काटे कि बच्चे कब आएंगे?
कब सब एक साथ मेरे सामने होंगे?
कब मै उनके मुस्कुराते चेहरे देखूंगी?
कब मेरा घर उनकी आवाजों की गूंज से मन मोह लेगा?
शायद समय नहीं था उनके पास, मै भी समझती थी मैने अपनी बेटियो और बेटो को अच्छी और ऊंची तालीम दी हैं । आज सब कमा रहे हैं आज़ाद है,खुद मुख्तार हैं, स्वाभिमानी हैं,सच्चे है,दुनिया की नज़रों में आज उनका मान सम्मान है । यही तो हम दोनों ने चाहा था ।
पर उनको खुश देख कर मेरी खुशी कहीं दम तोड गई। मेरी हसरतें धुंधली हो गई। दबा ली मैने अपनी ख्वाहिशें, कहती ज़रूर थी पर ज़िद्द नहीं करती थी। आखिर मां के साथ एक औरत, एक पत्नी भी थी।
इनके बाबू जी समझाते थे । मै हूं तेरे साथ, बच्चे आते तो है ही समय समय पर , उनको देख कर खुश रह बस….
बाप है हिम्मती है, साहसी है, मौन हैं, स्वाभिमानी हैं,और मर्द हैं। उनको दर्द भी होगा तो कहेंगे नहीं।
मै खुश हूं,आज मैने अपनी खिदमत नहीं कराई, आज भी मै अपने पैरों पर खड़ी थी। अभी तक खुद करा खुद के लिए मेहनत की। खुद के लिए खड़ी रही हर परिस्थिति में अकेले निपटी ।
इनके बाबू जी ने साथ निभाया हर कदम पे …
मै जुड़ी थी उनसे, पर आज उनकी गगनभेदी चीख परेशान कर रही थी मुझे, वो मेरा माथा सहला रहे थे ।
और मैं कह रही थी,”
अलग नहीं हुई हूं आपसे, रहूंगी हमेशा आस – पास,
गई नहीं हूं कहीं,
निभाऊंगी साथ….
तुम बात करना ,
नज़र तो नहीं आऊंगी,
पर सुनूंगी हमेशा आपकी हर बात,
खुशुबू जब भी आए एहसासों की समझना हंसी हूं मै,
यही हूं आपके साथ करूंगी हर बच्चे का इंतज़ार ,
आएंगे सब एक साथ फिर करेंगे बात,
मुझे कहते थे ,”तुझे कहा सुनाई देती है पूरी बात”,
एहसासों से पहचान लेती थी मैं हर बच्चे के मन की बात,
यह मत सोचना अब करोगे अपनी मनमानी तुम,
महकती रहूंगी इस आंगन में बनके कभी रात की रानी,
कभी तुलसी,कभी गुलाब,कभी कली…..
कभी बन जाऊंगी परी ,
चली जाऊंगी आकाश,
आज़ाद हो गई हूं इस नश्वर शरीर से,
पर रहूंगी हमेशा आस पास,
गई नहीं हूं कहीं,
निभाऊंगी साथ….
मां हूं दुआ यही करूंगी….
“अपने बच्चो की हंसी की खातिर,ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं”…
आएंगे सब अपने बच्चो के साथ,
खेलना सब वहीं खेल जो तुम खेलते थे बचपन में,
मै भी खुशबू बनकर तुम सबके चारों और फैल जाऊंगी,
महक समझ कर महसूस करना मुझे,
चित्कार, दुख, आंसू, दर्द , नहीं बहाना,
बाबू जी को सब बताना मन की बात,
मै भी सुनती रहूंगी,
हर फैसले में रहूंगी साथ,
रोने नहीं देना उन्हें,
अकेला नहीं छोड़ना अब उनको,
हिम्मत दिखाएंगे ज़रूर,पर तुम मत मानना,
मेरी इच्छा है यह ,
हंसे सब मिलकर,
और मै भी तुलसी बनकर इस आंगन में महकती रहूं।
कोई शिकायत हो तो कह देना अब बेहिचक ,
वो ही हैं तुम्हारी मां तक पहुंचने वाले तुम्हारी बात ,
पर आ जाओ अब लौट के,
जो बात जीते जी ना कह पाई ,
आज हिम्मत आईं है,
क्योंकि आज मेरे जाने के बाद ही सही मेरे घर में रौनक आईं हैं……
हर उस मां को समर्पित जो आज हमारे बीच नहीं है…..शैय्या पर लेटी है , पर फिर भी खुश हैं…
शत शत नमन